Friday, 14 December 2018

ईश्वर की कलम


एक बार एक नर्तकी जो की बहुत ही सुन्दर थी जो भी देखता उसकी प्रसन्नसा करता। एक दिन वह नृत्य कर रही थी।
तभी वहाँ से रामतीर्थ जी जा रहे थे वो भी रूक कर उस नृत्यांगना की नृत्य की कला को देखने लगेऔर विचारों मे इतने खो गए की नृत्य खत्म हो गया।
तभी नर्तकी पास आकर व्यंग्य करने लगी। बोली – भेष तो धारण किया है संतों का, और इतने ध्यान से मेरे सौन्दर्य को निहार रहे हो क्या यही ईशवर की भक्ति करते हो?
संत बोले: ना तुझे देखता न तेरे रूप को देखता हूँ। देखता हू तो अपने मालिक की कलम देखता हूँ। ना तेरे हुस्न से मतलब माँ हमको ना तेरे नृत्य से। मालिक की कलम ऐसी है माँ तो वो मालिक कैसा होगा। जिस मालिक ने तुझे इतना सुंदर बना वो स्वयम कितना सुंदर होगा।  मैं तो यही सोच कर नतमस्तक हो रहा हूँ माँ।
वो नर्तकी बहुत शर्मिदा हुई और संत के उच्च विचार सुन कर चरणों मे गिर पडी ।
संत ने कहा: माँ कुछ समय पश्चात ना यह सौंदर्य रहेगा, ना यह सौंदर्य के चाहने वाले तब तभी वो ईश्वर तुझे चाहेगा तो क्यो न इस ईश्वर की रचना को ईश्वर के लिए लगाओ जन्म सफल हो जाएगा ।
नर्तकी को वो शब्द तीर की तरह घायल कर गए। वहाँ से उस नर्तकी का जीवन बदल गया ओर उसने भक्ति मार्ग पर कदम रखा तो एक महान संत का रूप लेकर उभरी जहाँ से अपना जीवन ही नही नाम भी सफल किया ईशवर को प्राप्त किया।
धन्य हे वो जीव आत्म जो संत के शब्दो को ध्यान से केवल सुनते ही नही जीवन मे पूरी तरह उतारते भी है।

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