Friday, 14 December 2018

एक रिश्ता


जब मैं रात को घर पंहुचा तो मेरी पत्नी ने खाना लगाया। मैंने उसका हाथ अपने हाथों में लिया और कहा मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात कहना है। वो शांत बैठकर खाना खा रही थी।
उसकी आखों में कुछ दर्द सा साफ़ नज़र आ रहा था। मुझे नहीं पता उससे कैसे कहूं मगर मुझे उसे बताना ही था। मैंने बड़ी शांति से कहा – मुझे तलाक चाहिए। लगा जैसे उसे मेरे शब्दों से कुछ फर्क नहीं पड़ा बल्कि उसने मुझसे पूछा क्यों तलाक चाहिए ?
मैंने उसके सवाल को अनसुना किया तो उसे गुस्सा आ गया। उसने चम्मच उठाकर फेंक दिया और जोर से चिल्लाई – तुम इन्सान नहीं हो ! उस रात, हमने एक दुसरे से बात नहीं की, वो रो रही थी !
मुझे पता था कि वो जानना चाहती थी कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो हमारा रिश्ता टूटने की कगार पर आ गया। पर मेरे लिए उसके सवालों का जवाब दे पाना नामुमकिन था। मैं अब किसी और से (प्रिया नाम था उसका) प्यार करने लगा हूँ। अब मुझे उससे प्यार नहीं रहा। मैंने उसे उसके बरसो के प्यार की सजा दी थी।
भरे मन से मैंने तलाक के पेपर तैयार किये। उसमें लिखा था कि वह पूरा घर, कार और कंपनी की 30% शेयर ले सकती है इस तलाक के बदले में। लेकिन उसने उन पेपर्स को देखा और उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
वो औरत जिसने मेरे साथ जीवन के दस साल बिताये थे वो आज मेरे लिए अनजान हो चुकी थी। मुझे इन दस सालों का जो उसने मेरे लिए बर्बाद किये। मगर मैं क्या करूँ जो हो चूका उसे मैं बदल नहीं सकता था। क्योंकि मैं किसी और से अपनी पत्नी से भी ज्यादा प्यार करने लगा था।
आख़िरकार उसके सब्र का बांध टूट गया और वो फुट-फुट कर मेरे सामने रोने लगी। मेरे लिए उसका रोना एक तरह से उसकी रिहाई की तरह था। तलाक की ये बात जो कई दिनों से मुझे परेशान कर रही थी अब बिलकुल साफ़ हो चुकी थी !
अगले दिन मैं घर काफी लेट आया। मैंने देखा कि वो टेबल पर बैठ कर कुछ लिख रही थी। मैंने शाम का खाना नहीं खाया था लेकिन फिर भी में सीधे ऊपर जाकर अपने कमरे में सो गया। क्योंकि पूरा दिन प्रिया के साथ रहने और कई जगह घूमने के बाद मैं थक गया था।
वो शायद रात को उसी टेबल पर लिखते-लिखते सो गई थी। सुबह उसने तलाक देने की शर्ते बताई। वो मुझसे कुछ भी लेना नहीं चाहती थी। उसे सिर्फ तलाक से पहले एक महीने का समय चाहिए था। उसने आग्रह किया कि इस एक महीने में हम दोनों वही पुराना वाला जीवन जीयें जितना संभव हो सके। क्योंकि आने वाले महीने में हमारे बेटे की परीक्षा है। वह नहीं चाहती थी कि हमारे टूटे रिश्ते का प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़े।
मुझे भी यह ठीक लगा। मगर वो कुछ और भी चाहती थी जेसे शादी के दिन मैं उसे उठा कर अपने शयनकक्ष तक ले गया था। उसी तरह हर रोज एक महीने तक मैं उसे शयनकक्ष से उठा कर मुख्य द्वार तक ले जाऊं। मुझे लगा यह पागलपन है मगर इन आखरी दिनों को थोडा अच्छा बनाने के लिए मैंने उसकी यह शर्त स्वीकार कर ली।
मेने प्रिया को अपनी पत्नी की सभी शर्ते बताई। वो हँसने लगी। उसे लगा मेरी पत्नी कितने भी तरीके अपना ले तलाक होना तो तय है।
एक दिन वह अपनी पसंद की साड़ी निकाल रही थी। लेकिन कुछ खास नहीं ढूंढ पाई। उसने साँस भरते हुए कहा कि उसके सारे कपडे बड़े पड़ने लगे हैं। तब मुझे पता चला कि वह काफी दुबली हो गयी है और इसीलिए मैं उसे आसानी से उठा पा रहा था।
मेरे दिल को एक झटका सा लगा। उसने अपने दिल में काफी सारा दर्द छुपा रखा था पता नहीं कैसे मैं आगे बढ़ा और उसके सिर को छूकर देखा। अचानक हमारा बेटा आया और बोला कि पापा ये तो मम्मा को उठाकर बहार ले जाने का समय हो गया है। उसके लिए अपने पापा द्वारा मम्मा को इस तरह उठाकर ले जाते हुए देखना जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया था।
मेरी बीवी ने हमारे बच्चे को बुलाया और जोर से उसे गले लगा लिया। मैंने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया। मुझे लगा कहीं मैं अपना निर्णय न बदल लूँ। मैंने अपनी पत्नी को रोज की तरह उठाया और बेडरूम से सिटींग रूम होते हुए हॉल तक लाया। उसने प्यार से अपने दोनों हाथ मेरी गर्दन के आस-पास रख दिए। मैंने उसे जोर से पकड़ रखा था बिलकुल हमारे सुहागरात की तरह।
मगर उसका इतना कम वजन मुझे परेशान कर रहा था। महीने के आखरी दिन जब मैंने उसे उठाया तो मेरे लिए एक कदम भी चल पाना मुश्किल हो रहा था। हमारा बेटा स्कूल जा चूका था। मैं अपनी कार से ऑफिस गया और कार से कूद कर बाहर आ गया बिना कार को लॉक किये। मुझे डर था कि अब एक पल की भी देरी मेरा इरादा बदल देगी। मैं उपर गया। प्रिया ने दरवाज़ा खोला और मेने उससे कहा – सॉरी प्रिया ! अब मैं अपनी पत्नी से तलाक नहीं लेना चाहता।
उसने मुझे देखा और मेरे सिर पर हाथ फेरकर कहा – तुम्हें बुखार तो नहीं है ? मैंने उसका हाथ हटाया और कहा – सॉरी प्रिया ! अब मुझे अपनी पत्नी से तलाक नहीं चाहिए।
हमारी शादीसुदा जिंदगी शायद हम दोनों के ध्यान न देने की वजह से बोरिंग हो गयी थी। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि हम एक-दुसरे से प्यार नहीं करते। अब मुझे एहसास हुआ है कि जिस दिन मैं उसे शादी करके अपने घर लाया था उस दिन से जीवन के आखरी दिन तक मुझे उसका साथ निभाना है।
प्रिया के होश उड़ गए। उसने मुझे एक जोरदार चाँटा जड़ दिया मेरे मुह पर। वह रोने लगी और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा और आकर अपने कार में बेठ गया।
आगे एक फुल वाले की दुकान पर रुका और अपनी प्यारी पत्नी के लिए एक सुंदर सा गुलदस्ता लिया। दूकानदार ने पूछा कि इस पर क्या लिखना है ? मैंने मुस्कुराते हुए कहा कि “मैं तुम्हें जीवन के आखरी दिन तक यूँ ही उठाता रहूँगा मेरी अर्धांगिनी। ”
उस शाम जब मैं घर आया हाथों में गुलदस्ता लिए। मेरे चेहरे पर एक मुस्कान थी। मैं उपर अपने कमरे की तरफ भाग कर गया। लेकिन तब तक वह मुझे छोड़ कर इस दुनिया से जा चुकी थी हमेशा के लिए। वो कई महीनो से कैंसर से लड़ रही थी लेकिन मैं प्रिया के साथ इतना खोया हुआ था कि कभी ध्यान ही नहीं रहा।
उसे पता था वह जल्दी ही मुझे छोड़ कर जाने वाली है इसलिए वह मुझे और मेरे बेटे के रिश्ते को टूटने से बचाना चाहती थी। मैं नीच उससे तलाक लेना चाहता था लेकिन फिर भी उसने मुझे अपने बच्चे की नज़रों में एक प्यारा पति और पिता बना दिया था।

जीवन की छोटी-छोटी बातें रिश्तों में बहुत महत्त्व रखती है। बड़ा घर, बड़ी कार और बैंक बैलेंस ये खुशियों का हिस्सा जरुर बन सकते हैं मगर अपनों के बिना इनकी कोई कीमत नहीं।

ईश्वर की कलम


एक बार एक नर्तकी जो की बहुत ही सुन्दर थी जो भी देखता उसकी प्रसन्नसा करता। एक दिन वह नृत्य कर रही थी।
तभी वहाँ से रामतीर्थ जी जा रहे थे वो भी रूक कर उस नृत्यांगना की नृत्य की कला को देखने लगेऔर विचारों मे इतने खो गए की नृत्य खत्म हो गया।
तभी नर्तकी पास आकर व्यंग्य करने लगी। बोली – भेष तो धारण किया है संतों का, और इतने ध्यान से मेरे सौन्दर्य को निहार रहे हो क्या यही ईशवर की भक्ति करते हो?
संत बोले: ना तुझे देखता न तेरे रूप को देखता हूँ। देखता हू तो अपने मालिक की कलम देखता हूँ। ना तेरे हुस्न से मतलब माँ हमको ना तेरे नृत्य से। मालिक की कलम ऐसी है माँ तो वो मालिक कैसा होगा। जिस मालिक ने तुझे इतना सुंदर बना वो स्वयम कितना सुंदर होगा।  मैं तो यही सोच कर नतमस्तक हो रहा हूँ माँ।
वो नर्तकी बहुत शर्मिदा हुई और संत के उच्च विचार सुन कर चरणों मे गिर पडी ।
संत ने कहा: माँ कुछ समय पश्चात ना यह सौंदर्य रहेगा, ना यह सौंदर्य के चाहने वाले तब तभी वो ईश्वर तुझे चाहेगा तो क्यो न इस ईश्वर की रचना को ईश्वर के लिए लगाओ जन्म सफल हो जाएगा ।
नर्तकी को वो शब्द तीर की तरह घायल कर गए। वहाँ से उस नर्तकी का जीवन बदल गया ओर उसने भक्ति मार्ग पर कदम रखा तो एक महान संत का रूप लेकर उभरी जहाँ से अपना जीवन ही नही नाम भी सफल किया ईशवर को प्राप्त किया।
धन्य हे वो जीव आत्म जो संत के शब्दो को ध्यान से केवल सुनते ही नही जीवन मे पूरी तरह उतारते भी है।

भगवान् बचाएगा


एक समय की बात है किसी गाँव में एक साधु रहता था, वह भगवान का बहुत बड़ा भक्त था और निरंतर एक पेड़ के नीचे बैठ कर तपस्या किया करता था | उसका भागवान पर अटूट विश्वास था और गाँव वाले भी उसकी इज्ज़त करते थे|
एक बार गाँव में बहुत भीषण बाढ़ आ गई | चारो तरफ पानी ही पानी दिखाई देने लगा, सभी लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊँचे स्थानों की तरफ बढ़ने लगे| जब लोगों ने देखा कि साधु महाराज अभी भी पेड़ के नीचे बैठे भगवान का नाम जप रहे हैं तो उन्हें यह जगह छोड़ने की सलाह दी|
साधु ने कहा:  “तुम लोग अपनी जान बचाओ मुझे तो मेरा भगवान बचाएगा!”
धीरे-धीरे पानी का स्तर बढ़ता गया, और पानी साधु के कमर तक आ पहुंचा, इतने में वहां से एक नाव गुजरी|
मल्लाह ने कहा: “हे साधू महाराज आप इस नाव पर सवार हो जाइए मैं आपको सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दूंगा|”
साधु ने कहा: “नहीं, मुझे तुम्हारी मदद की आवश्यकता नहीं है, मुझे तो मेरा भगवान बचाएगा!
नाव वाला चुप-चाप वहां से चला गया.
कुछ देर बाद बाढ़ और प्रचंड हो गयी, साधु ने पेड़ पर चढ़ना उचित समझा और वहां बैठ कर ईश्वर को याद करने लगा| तभी अचानक उन्हें गड़गडाहत की आवाज़ सुनाई दी, एक हेलिकोप्टर उनकी मदद के लिए आ पहुंचा, बचाव दल ने एक रस्सी लटकाई और साधु को उसे जोर से पकड़ने का आग्रह किया|
साधु फिर बोला:  “मैं इसे नहीं पकडूँगा, मुझे तो मेरा भगवान बचाएगा|”
उनकी हठ के आगे बचाव दल भी उन्हें लिए बगैर वहां से चला गया|
कुछ ही देर में पेड़ बाढ़ की धारा में बह गया और साधु की मृत्यु हो गयी|
मरने के बाद साधु महाराज स्वर्ग पहुचे और भगवान से बोले: “हे प्रभु मैंने तुम्हारी पूरी लगन के साथ आराधना की, तपस्या की पर जब मै पानी में डूब कर मर रहा था तब तुम मुझे बचाने नहीं आये, ऐसा क्यों प्रभु?
भगवान बोले: “हे साधु महात्मा मै तुम्हारी रक्षा करने एक नहीं बल्कि तीन बार आया, पहला- ग्रामीणों के रूप में, दूसरा नाव वाले के रूप में, और तीसरा, हेलीकाप्टर बचाव दल के रूप में. किन्तु तुम मेरे इन अवसरों को पहचान नहीं पाए”

मित्रों, इस जीवन में ईश्वर हमें कई अवसर देता है, इन अवसरों की प्रकृति कुछ ऐसी होती है कि वे किसी की प्रतीक्षा नहीं करते है, वे एक दौड़ते हुआ घोड़े के सामान होते हैं जो हमारे सामने से तेजी से गुजरते हैं, यदि हम उन्हें पहचान कर उनका लाभ उठा लेते है तो वे हमें हमारी मंजिल तक पंहुचा देते है, अन्यथा हमें बाद में पछताना ही पड़ता है|

सफ़ेद बाल, गजब चाल


एक बुजुर्ग ट्रैन में सफर कर रहे थे।  अपने डिब्बे में वह अकेले थे।  अगले स्टेशन पर उस डिब्बे में 8-10 लड़के चढ़ गए और बैठकर मस्ती करने लगे।  एक ने कहा, “चलो जंजीर खींचते हैं।”  दूसरे ने कहा, “यहाँ लिखा है, जंजीर खींचने पर 500 रुपए जुर्माना और छह महीने कैद।” तीसरे ने कहा, “इतने लोग हैं, चंदा करके 500 रुपए जमा कर देंगे।  चंदा किया गया तो 500 की जगह 1200 रुपए जमा हो गए।  रुपयों को पहले वाले लड़के ने जेब में रख लिया। एक लड़के ने कहा, “जंजीर खींचते हैं, अगर किसी ने पूछा तो कह देंगे कि बूढ़े अंकल ने खींची है।  पैसे नहीं देने पड़ेंगे।”
बूढ़े ने हाथ जोड़कर कहा, “बच्चो, मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? मुझे क्यों फसा रहे हो? लेकिन किसी को दया नहीं आई।  जंजीर खींच दी गई और टीटीई, सिपाही के साथ डिब्बे में आ गया।
सभी लड़कों ने कहा कि बूढ़े अंकल ने जंजीर खींची हैं।  टीटीई ने बुजुर्ग से कहा, “शर्म नहीं आती, एक उम्र में ऐसी हरकत करते हुए।”
बूढ़े ने हाथ जोड़कर कहा, “साहब, हां मैंने जंजीर खींची है, लेकिन मेरी मजबूरी थी।  मेरे पास सिर्फ 1200 रुपए थे, जो इन लड़कों ने छीन लिए।  रुपए इस लड़के की जेब में हैं।” बुजुर्ग ने पहले वाले लड़के की तरफ इशारा किया।
टीटीई ने सिपाही से कहा, “इस लड़के की तलाशी लो”
लड़के की जेब से 1200 रुपए मिल गए।
टीटीई ने बुजुर्ग को सारे पैसे दे दिए और लड़कों को अगले स्टेशन पर पुलिस के हवाले कर दिया।  जाते समय लड़कों ने निराशा से बुजुर्ग की और देखा।
बुजुर्ग ने अपने सफ़ेद बालों में हाथ फिराते हुए कहा, “बेटा, ये बाल यूं ही सफ़ेद नहीं हुए हैं।